गुरुवार, 24 सितंबर 2020

कवि भास्कर सिंह माणिक कोंच द्वारा विषय- “रात बढ़ने लगी” पर रचना

मंच को नमन
दिनांक - 24 सितंबर 2020
विषय- रात बढ़ने लगी

अब तक नहीं लोटा
मेरा बेटा मोटा
प्रात से सांझ हो गई
रात बढ़ने लगी

काम की तलाश में
रोटी की आस में
कह गया था
जा रहा पास में
गया था उजाले
रात बढ़ने लगी

चेहरे उदास 
बैठे बच्चे आस
पापा आएंगे
छोटू करेगा हास
होगा सफल प्रयास
मिलेगा पेट को ग्रास
मिटेगा संत्रास
गया था प्रकाश
रात बढ़ने लगी

मिलेगी
चूल्हे को लकड़ी
पकेगी खिचड़ी
धुलेगी गुदड़ी
सुधरेगी खिड़की
हो गई सुबह से शाम
रात बढ़ने लगी

प्रिया बैठी द्वार
करें ईश से पुकार
होंगे कुशल
वो करेंगे प्यार
न कोई देता उधार
सब देते दुत्कार
यह कैसा ज्वार
चुप बैठा उपकार
अब न दिखती किरण
रात बढ़ने लगी
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मैं घोषणा करता हूं कि यह रचना मौलिक स्वरचित है।
भास्कर सिंह माणिक (कवि एवं समीक्षक)कोंच

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