शनिवार, 26 सितंबर 2020

कवि शिवशंकर लोध राजपूत जी द्वारा रचना (विषय- चिट्ठी)

*चिट्ठी*

अमित और शिवशंकर बहुत दिनों के बाद मिले और चाय की दुकान पर बैठ कर चाय की चुस्की ले रहे थे और वार्तालाप भी जारी था अमित कि एकाएक नजर पड़ोस की कबाड़ी की दुकान मे रखी रददी मे एक चिट्ठी पर पडी  उसको उठाया बीस साल पहले की तारीख लिखी थी !
अमित के हाथ मे चिट्ठी देखकर पत्र लिखने की याद आ गई पहले संदेश अन्तर्देशीय लिफाफा व पोस्ट कार्ड पर लिख कर पोस्ट बॉक्स मे डाल देते थे 15-20 दिन के बाद तब कही जाकर चिट्ठी मिलती थी गाँव मे डाकिया के द्वारा, डाकिया गाँव गाँव जा कर साईकिल से चिट्टी,तार, बैरन पत्र (जो कि एक सादे कागज पर संदेश लिख कर कागज का ही लिफाफा बना कर गोद से चिपका कर बिना पोस्ट टिकट लगाये लेटर बॉक्स मे डाल देते थे भारतीय पोस्ट उसपर दो रूपये का स्टैम्प लगा कर गंतव्य के पते पर भेज देती थी उस दो रूपये का भुगतान डाकिया उस आदमी से लेता था जिसके नाम से बैरन पत्र होता था), मनीआर्डर के द्वारा लगाया पैसा भी देने जाया करता था गाँव के सब लोग जब डाकिया आता था तो पूछते थे हमारा मनीआर्डर या चिट्ठी -पत्र है डाकिया जी, गाँव मे एक चिड़िया (मोटरी)जब बोलती थी गाँव मे तो लोग कहते थे कि आज कोई संदेश पत्र या पैसा आएगा उनकी खुशी का ठिकाना नहीं होता था लोग चिट्ठी जब पढ़ते थे तो आस पड़ोस के लोग सुनने आया करते थे उनमे कुछ लोगों का नाम भी होता था राम राम लिखी होती थी कितना आपस मे प्रेम था लोगों मे मानो भक्त को भगवान मिल गए हो बड़ो को प्रणाम, छोटों को प्यार व आशीर्वाद लिखा होता था चिट्टी मे शुरूआत मे पूजनीय,अादरणीय, सादर प्रणाम, सप्रेम, स्नेह शब्दों का प्रयोग होता था सम्मानपूर्वक आज कल तो मोबाइल के आने से तो चिट्ठी का जमाना ही खत्म हो गया दिन मे कई बार मोबाइल से बात हो जाती है परिवार मे जितने लोग है उतने ही मोबाइल है प्राइवेसी परिवार के मुखिया की खत्म, एकल स्वमित्त्व ख़त्म परिवार मे एक के द्वारा संदेश भेजा जाता था सोच समझकर क्योंकि गाँव मे शिक्षित लोग कम ही थे पहले, अब तो फिर भी शिक्षा के प्रति जागरूप है लोग, चिट्ठी पढ़ाने के लिए गाँव मे एकादा ही पढ़ा लिखा इंसान होता था ढूढ़ँना पड़ता था !

शिवशंकर जी बिल्कुल सत्य कहा आपने वह जमाना बहुत अच्छा था |आजकल तो लोग फेसबुक व्हाट्सएप की झूठी दुनिया में जी रहे हैं | जहां दिल की बात का सच्चा महत्व नहीं होता | एक वह समय था जब व्यक्ति अपने हाथों से पत्र लिखकर | दूर होते हुए भी समीप पहुंच जाता  था | सच्ची और असल दुनिया वही थी |

शिवशंकर लोध राजपूत 
(दिल्ली)

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