मंगलवार, 28 जुलाई 2020

कभी चाँदनी सी धवल कभी सुर्ख गुलाबों की लाली है ।उतरती है मुझ में चाँदनी सी सुकून शांति की कहानी है।।

कभी चाँदनी सी  धवल
कभी सुर्ख गुलाबों की लाली है ।
उतरती है मुझ में चाँदनी सी

सुकून शांति की कहानी है।।


वह मेरी प्रेमिका मेरी महबूबा कहलाती है ।


चहकती है वह धूप सी ,


चमकती है ओस बनकर ।


हिंदी सी सहज निश्चला है,


पर तेवर तीखे उर्दू वाली है ।।


वह मेरी प्रेमिका मेरी महबूबा कहलाती है ।


वह शांत ,मृदु ,उज्जवल सुबह सी,


बसंती बयार सी मतवाली है ।


फूलों से भी कोमल मन उसका,


नैनों में संपूर्ण जहां बसाती हैं ।।


वह मेरी प्रेमिका मेरी महबूबा कहलाती है ।


गुस्साती है काली घटा बन जाती ,


गरजती ,चमकती ,बरस जाती ।


करुण रस छलका जाती ,


अपनी एहसास जगा जाती।।


प्यासी प्रेमी की महबूबा कहलाती है ।


रूहानी है इश्क उसका ,
काली घटा सा उसका क्रोध ।
कांति, आभा, सूर्य के जैसी,
शीतल धवल चंद्रमा भी मौन ।।

वह मेरी प्रेमिका मेरी महबूबा कहलाती है ।

मुस्कान उसके होठों की ,
पतझड़ में सब रंग खिलें।
लहराते, इठलाते ,बलखाते केश
उर में मयूरा नृत्य करें ।।

वह मेरी प्रेमिका मेरी महबूबा कहलाती है ।

अंशु प्रिया अग्रवाल
मस्कत ओमान

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें