बुधवार, 16 सितंबर 2020

हिन्दी दिवस एक दिन या 365 दिन#जितेन्द्र विजयश्री पाण्डेय "जीत" जी के द्वारा अद्वितीय रचना#

शीर्षक - *हिंदी दिवस - साल का मात्र एक दिन या ३६५ दिन*

हिंदी दिवस १४ सितंबर १९४९ से मनाते चले आ रहे हैं पर क्या एक दिन इस भाषा के लिए उपयुक्त है या पर्याप्त है? अरे! जिस देश में हिंदी के लिए *२ दबाएं* वाली संगणक/मशीनी आवाज़ बाध्य करती हो, जिस देश में ९० फ़ीसदी लोग हस्ताक्षर तक आंग्ल भाषा में करते हों, जिस देश में न्याय की प्रणाली ही हिंदी को उपेक्षा की नज़र से नज़रअंदाज़ कर चुकी हो, जिस देश में हिंदी बोलने वाले को कमतर आंका जाता हो, जिस देश में हिंदी अंकों से लिखी गाड़ियों की नंबर प्लेट होने पर चालान काट दिया जाता हो, जिस देश में अंग्रेजी माध्यम का होने पर देश की बड़ी-बड़ी परीक्षाओं में हिंदी माध्यम की तुलना में अधिक अंक दिए जाते हों, हम उस हिंदी के लिए मात्र एक दिन का हिंदी दिवस मनाकर ख़ुशियाँ मना लेते हैं या गर्व कर लेते हैं कि हमारी मातृभाषा हिंदी है। 

ज़नाब, हिंदी भावों की अभिव्यक्ति है। हिंदी की अहमियत इसी बात से है कि जब तक हिंदी ज़बान पर नहीं आती न सच सबकुछ अधूरा-सा लगता है मानो प्रेमरस की चाशनी में डूबा हुआ प्रियतम अपनी प्रेयसी के अभाव में उसके विछोह में अधीर और व्याकुल हो जाता है। हिंदी में जो अपनापन होता है, वो अन्य भाषाओं में ख़ालीपन का एहसास दिलाता है। मातृभाषा हिंदी ज़ह मानस या जन सामान्य की भाषा होने के साथ ही एक ऐसी भाषा है जिसे देश का हर कोना, हर बच्चा, हर बूढ़ा और हर स्त्री आसानी से समझ जाती है या समझ जाते हैं क्योंकि हिंदी सहजता के नाम है परंतु लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ ही जब इस भाषा की शुरुआत देश में की तो उसकी मंशा या कहूँ उसकी दूरदर्शिता यही थी कि भले अंग्रेज हिंदुस्तान को छोड़कर चले भी जाएं पर गुलाम या पराधीनता की उस मानसिकता को वो अंग्रेजी या आंग्ल भाषा के रूप में कभी हटा नहीं पाएंगे। 

आज़ादी के इतने वर्षों के बाद भी हिंदी राजभाषा ही बनकर रह चुकी है। आखिर कौन-से कारण हैं कि समूचे देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा आज भी राष्ट्रीय भाषा का दर्ज़ा प्राप्त करने में असफल रही है। अंग्रेजी काम की भाषा है और हिंदी घर की भाषा है तो ज़रुरत है घरवाली को मोहब्बत करने की, उसे सजाने-संवारने की, उसके संवर्धन की और बाहरवाली को बाहर तक ही सीमित रखने की। उसे अपनी ज़रूरत नहीं अपितु प्रयोग करने की भाषा रूप में रखने की। कोई भी भाषा का अपमान नहीं करना चाहिए परंतु अफ़सोस हमारी हिंदी न जाने कब से दो चार होती आ रही है। वक़्त है ज़ेहन में घुसे दुर्विचारों को दूर करने की। हिंदी में कार्य व्यवहार के साथ ही हिंदी में काम-काज को बढ़ावा देने की नहीं तो लाख़ हम विकासशील से विकसित देश की श्रेणी में शामिल हो जाएं पर हमेशा अंग्रेजियत या अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम बनकर रह जाएंगे।
*लेखक - जितेन्द्र विजयश्री पाण्डेय "जीत" प्रयागराज, उत्तर प्रदेश*
*रचना मौलिक अप्रकाशित*

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