शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

लॉक डाउन में शिक्षकों की स्थिति# शालिनी जी के द्वारा शानदार रचना#

मंच को नमन 🙏🙏

बदलाव मंच राष्ट्रीय - अंतर्राष्ट्रीय साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु गद्य रचना.. 💐💐

विषय : लॉक डाउन में  शिक्षकों की स्थिति ✒️✒️
विधा : गद्य (लेख )

 सर्वप्रथम में राष्ट्रीय - अन्तर्राष्ट्रीय  बदलाव मंच का हार्दिक अभिनन्दन करती हूँ, जिन्होंने न केवल साहित्यिक विस्तार अपितु उनसे संबंधित हर प्रतिभावान और नव आगंतुकों का भी भरपूर सहयोग किया है | इस मंच के प्रत्येक पदाधिकारियों और सदस्यों का मैं सहृदय आभार व्यक्त करती हूँ |
                      "शिक्षक ",  जिन्हें हम राष्ट्र निर्माता के रूप में देखते हैं, जिन्होंने अपने कर्तव्य परायणता, सूझबूझ, कार्य - कुशलता आदि से बच्चों के स्वर्णिम भविष्य हेतु अपना सर्वस्व अर्पित कर दृढ़ निश्चयी  होकर भागीदारी सुनिश्चित की है | जिनका स्वयं का अस्तित्व आज के वर्तमान परिपेक्ष्य में अत्यंत गंभीर एवं सोचनीय अवस्था में दिखाई पड़ती है | "शिक्षक " जिस शब्द को सुनकर ही हमारा मन श्रद्धा और आदर से अभिभूत हो जाता है, उनकी ओर सरकार और समाज का दृष्टिहीन बनना  मानवता का हनन करने जैसा प्रतीत होता है | " शिक्षक" जो साक्षात् मां शारदे का रूप माने जाते हैं, उनके आर्थिक स्थिति की दयनीयता की ओर सरकार की अनदेखी शिक्षक के मनोबल को अंतर्मन तक विहल कर रही है...और उनकी इस वेदना के मद्देनज़र "रामधारी सिंह दिनकर " की यह पंक्तियां सहसा स्मरण हो आती है कि.... 

    " कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है, 
      मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है ? 
      दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे, 
      बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे..!!"
        
                     गौरतलब है कि वर्तमान में कोरोना काल के इस संकट में सरकार की तरफ से हुए लॉकडाउन में चूंकि चारों ओर विषम परिस्थितियां दृष्टिगोचर होती है परंतु इन सब के बावजूद सरकार की तरफ से समय-समय पर राहत कार्य एवं जरूरतमंदों की सहायता तो की गई एवं हमारे राष्ट्र निर्माताओं से प्रवासी मजदूरों के लिए क्वारेंटाइन सेंटर बनाना, उनके खाने, रहने, चिकित्सा सुविधा उब्लब्ध कराना आदि की व्यवस्था की सहायता भी ली गई परंतु उनकी ओर ही सरकार की अनदेखी बहुत बड़ी विसंगति का घोतक है |
                       हालांकि इस लॉक डाउन की स्थिति में सरकारी हो या प्राइवेट सभी शिक्षकों की धरातल पर आर्थिक स्थिति बोझिल बनी हुई है | हमारे यहां शिक्षकों का वेतन इतना नहीं होता कि वे अपनी जीविकोपार्जन के सभी साधनों का उपयोग करते हुए अपने परिवार की देखभाल कर सकें | इसके लिए उन्हें अन्यत्र भी ट्यूशन, कोचिंग आदि का पारिवारिक पूर्ति हेतु सहारा लेना पड़ता है | वर्तमान कोरोना काल में ज्ञानतव्य है कि सभी शिक्षण संस्थान और स्कूल-कॉलेजों को पूर्णत: बंद रखने का आदेश सरकार द्वारा जारी किया गया है | वैसी स्थिति में सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह राष्ट्र निर्माताओं के लिए भी आर्थिक पैकेज की सहायता का एलान करते  |
                       गौरतलब है कि देश में इस संकटकालीन लॉकडाउन की स्थिति में भी शिक्षक अपने दायित्वों और कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए हर सरकारी फ़रमानों का पालन अपने जान को जोखिम में डालकर कर रहे हैं.... साथ ही ऑनलाइन क्लासेस, नामांकन पखवाड़ा, राशन का वितरण आदि कार्यों को बखूबी अंजाम दे रहे हैं,  जिससे हमारे नौनिहालों और उनके परिवारजनों को इस आपात स्थिति में राहत मिल सके | ऐसे में सरकार की दृष्टि कैसे शिक्षकों और उनके परिवारजनों की आर्थिक तंगी को नजरअंदाज कर रही है, यह एक शर्मनाक मानसिकता का परिचायक हैं  |
                  निष्कर्षत: मैं यही कहना चाहूंगी कि सरकार को निरंकुशता, हठधर्मिता को छोड़ मानवता का परिचय देना चाहिए और सभी कल्याणकारी योजनाओं, राहत कोष आदि कार्यों की तरह " राष्ट्र -निर्माता हमारे शिक्षकों " की आर्थिक एवं नैतिक मनोबल का ह्रास ना कर उनके आत्मबल और जज्बें का भी सम्मान कर  उनकी आर्थिक सहायता की और सफल कदम बढ़ाना चाहिए...|

     ***********************

     "शालिनी कुमारी "
          शिक्षिका 
      मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार )

(स्वरचित एवं मौलिक गद्य रचना )

 

मंच को नमन 🙏🙏

बदलाव मंच राष्ट्रीय - अंतर्राष्ट्रीय साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु गद्य रचना.. 💐💐

विषय : लॉक डाउन में  शिक्षकों की स्थिति ✒️✒️
विधा : गद्य (लेख )

 सर्वप्रथम में राष्ट्रीय - अन्तर्राष्ट्रीय  बदलाव मंच का हार्दिक अभिनन्दन करती हूँ, जिन्होंने न केवल साहित्यिक विस्तार अपितु उनसे संबंधित हर प्रतिभावान और नव आगंतुकों का भी भरपूर सहयोग किया है | इस मंच के प्रत्येक पदाधिकारियों और सदस्यों का मैं सहृदय आभार व्यक्त करती हूँ |
                      "शिक्षक ",  जिन्हें हम राष्ट्र निर्माता के रूप में देखते हैं, जिन्होंने अपने कर्तव्य परायणता, सूझबूझ, कार्य - कुशलता आदि से बच्चों के स्वर्णिम भविष्य हेतु अपना सर्वस्व अर्पित कर दृढ़ निश्चयी  होकर भागीदारी सुनिश्चित की है | जिनका स्वयं का अस्तित्व आज के वर्तमान परिपेक्ष्य में अत्यंत गंभीर एवं सोचनीय अवस्था में दिखाई पड़ती है | "शिक्षक " जिस शब्द को सुनकर ही हमारा मन श्रद्धा और आदर से अभिभूत हो जाता है, उनकी ओर सरकार और समाज का दृष्टिहीन बनना  मानवता का हनन करने जैसा प्रतीत होता है | " शिक्षक" जो साक्षात् मां शारदे का रूप माने जाते हैं, उनके आर्थिक स्थिति की दयनीयता की ओर सरकार की अनदेखी शिक्षक के मनोबल को अंतर्मन तक विहल कर रही है...और उनकी इस वेदना के मद्देनज़र "रामधारी सिंह दिनकर " की यह पंक्तियां सहसा स्मरण हो आती है कि.... 

    " कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है, 
      मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है ? 
      दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे, 
      बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे..!!"
        
                     गौरतलब है कि वर्तमान में कोरोना काल के इस संकट में सरकार की तरफ से हुए लॉकडाउन में चूंकि चारों ओर विषम परिस्थितियां दृष्टिगोचर होती है परंतु इन सब के बावजूद सरकार की तरफ से समय-समय पर राहत कार्य एवं जरूरतमंदों की सहायता तो की गई एवं हमारे राष्ट्र निर्माताओं से प्रवासी मजदूरों के लिए क्वारेंटाइन सेंटर बनाना, उनके खाने, रहने, चिकित्सा सुविधा उब्लब्ध कराना आदि की व्यवस्था की सहायता भी ली गई परंतु उनकी ओर ही सरकार की अनदेखी बहुत बड़ी विसंगति का घोतक है |
                       हालांकि इस लॉक डाउन की स्थिति में सरकारी हो या प्राइवेट सभी शिक्षकों की धरातल पर आर्थिक स्थिति बोझिल बनी हुई है | हमारे यहां शिक्षकों का वेतन इतना नहीं होता कि वे अपनी जीविकोपार्जन के सभी साधनों का उपयोग करते हुए अपने परिवार की देखभाल कर सकें | इसके लिए उन्हें अन्यत्र भी ट्यूशन, कोचिंग आदि का पारिवारिक पूर्ति हेतु सहारा लेना पड़ता है | वर्तमान कोरोना काल में ज्ञानतव्य है कि सभी शिक्षण संस्थान और स्कूल-कॉलेजों को पूर्णत: बंद रखने का आदेश सरकार द्वारा जारी किया गया है | वैसी स्थिति में सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह राष्ट्र निर्माताओं के लिए भी आर्थिक पैकेज की सहायता का एलान करते  |
                       गौरतलब है कि देश में इस संकटकालीन लॉकडाउन की स्थिति में भी शिक्षक अपने दायित्वों और कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए हर सरकारी फ़रमानों का पालन अपने जान को जोखिम में डालकर कर रहे हैं.... साथ ही ऑनलाइन क्लासेस, नामांकन पखवाड़ा, राशन का वितरण आदि कार्यों को बखूबी अंजाम दे रहे हैं,  जिससे हमारे नौनिहालों और उनके परिवारजनों को इस आपात स्थिति में राहत मिल सके | ऐसे में सरकार की दृष्टि कैसे शिक्षकों और उनके परिवारजनों की आर्थिक तंगी को नजरअंदाज कर रही है, यह एक शर्मनाक मानसिकता का परिचायक हैं  |
                  निष्कर्षत: मैं यही कहना चाहूंगी कि सरकार को निरंकुशता, हठधर्मिता को छोड़ मानवता का परिचय देना चाहिए और सभी कल्याणकारी योजनाओं, राहत कोष आदि कार्यों की तरह " राष्ट्र -निर्माता हमारे शिक्षकों " की आर्थिक एवं नैतिक मनोबल का ह्रास ना कर उनके आत्मबल और जज्बें का भी सम्मान कर  उनकी आर्थिक सहायता की  ओर  सफल कदम बढ़ाना चाहिए...|
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     "शालिनी कुमारी "
          शिक्षिका 
      मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार )

(स्वरचित एवं मौलिक गद्य रचना )

 

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---------- Forwarded message ---------
From: Shalini Kumari <shalinicoolin@gmail.com>
Date: Wed 2 Sep, 2020, 6:56 PM
Subject:
To: <badlavmanch.members@blogger.com>


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बदलाव मंच राष्ट्रीय - अंतर्राष्ट्रीय साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु गद्य रचना.. 💐💐

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 सर्वप्रथम में राष्ट्रीय - अन्तर्राष्ट्रीय  बदलाव मंच का हार्दिक अभिनन्दन करती हूँ, जिन्होंने न केवल साहित्यिक विस्तार अपितु उनसे संबंधित हर प्रतिभावान और नव आगंतुकों का भी भरपूर सहयोग किया है | इस मंच के प्रत्येक पदाधिकारियों और सदस्यों का मैं सहृदय आभार व्यक्त करती हूँ |
                      "शिक्षक ",  जिन्हें हम राष्ट्र निर्माता के रूप में देखते हैं, जिन्होंने अपने कर्तव्य परायणता, सूझबूझ, कार्य - कुशलता आदि से बच्चों के स्वर्णिम भविष्य हेतु अपना सर्वस्व अर्पित कर दृढ़ निश्चयी  होकर भागीदारी सुनिश्चित की है | जिनका स्वयं का अस्तित्व आज के वर्तमान परिपेक्ष्य में अत्यंत गंभीर एवं सोचनीय अवस्था में दिखाई पड़ती है | "शिक्षक " जिस शब्द को सुनकर ही हमारा मन श्रद्धा और आदर से अभिभूत हो जाता है, उनकी ओर सरकार और समाज का दृष्टिहीन बनना  मानवता का हनन करने जैसा प्रतीत होता है | " शिक्षक" जो साक्षात् मां शारदे का रूप माने जाते हैं, उनके आर्थिक स्थिति की दयनीयता की ओर सरकार की अनदेखी शिक्षक के मनोबल को अंतर्मन तक विहल कर रही है...और उनकी इस वेदना के मद्देनज़र "रामधारी सिंह दिनकर " की यह पंक्तियां सहसा स्मरण हो आती है कि.... 

    " कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है, 
      मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है ? 
      दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे, 
      बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे..!!"
        
                     गौरतलब है कि वर्तमान में कोरोना काल के इस संकट में सरकार की तरफ से हुए लॉकडाउन में चूंकि चारों ओर विषम परिस्थितियां दृष्टिगोचर होती है परंतु इन सब के बावजूद सरकार की तरफ से समय-समय पर राहत कार्य एवं जरूरतमंदों की सहायता तो की गई एवं हमारे राष्ट्र निर्माताओं से प्रवासी मजदूरों के लिए क्वारेंटाइन सेंटर बनाना, उनके खाने, रहने, चिकित्सा सुविधा उब्लब्ध कराना आदि की व्यवस्था की सहायता भी ली गई परंतु उनकी ओर ही सरकार की अनदेखी बहुत बड़ी विसंगति का घोतक है |
                       हालांकि इस लॉक डाउन की स्थिति में सरकारी हो या प्राइवेट सभी शिक्षकों की धरातल पर आर्थिक स्थिति बोझिल बनी हुई है | हमारे यहां शिक्षकों का वेतन इतना नहीं होता कि वे अपनी जीविकोपार्जन के सभी साधनों का उपयोग करते हुए अपने परिवार की देखभाल कर सकें | इसके लिए उन्हें अन्यत्र भी ट्यूशन, कोचिंग आदि का पारिवारिक पूर्ति हेतु सहारा लेना पड़ता है | वर्तमान कोरोना काल में ज्ञानतव्य है कि सभी शिक्षण संस्थान और स्कूल-कॉलेजों को पूर्णत: बंद रखने का आदेश सरकार द्वारा जारी किया गया है | वैसी स्थिति में सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह राष्ट्र निर्माताओं के लिए भी आर्थिक पैकेज की सहायता का एलान करते  |
                       गौरतलब है कि देश में इस संकटकालीन लॉकडाउन की स्थिति में भी शिक्षक अपने दायित्वों और कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए हर सरकारी फ़रमानों का पालन अपने जान को जोखिम में डालकर कर रहे हैं.... साथ ही ऑनलाइन क्लासेस, नामांकन पखवाड़ा, राशन का वितरण आदि कार्यों को बखूबी अंजाम दे रहे हैं,  जिससे हमारे नौनिहालों और उनके परिवारजनों को इस आपात स्थिति में राहत मिल सके | ऐसे में सरकार की दृष्टि कैसे शिक्षकों और उनके परिवारजनों की आर्थिक तंगी को नजरअंदाज कर रही है, यह एक शर्मनाक मानसिकता का परिचायक हैं  |
                  निष्कर्षत: मैं यही कहना चाहूंगी कि सरकार को निरंकुशता, हठधर्मिता को छोड़ मानवता का परिचय देना चाहिए और सभी कल्याणकारी योजनाओं, राहत कोष आदि कार्यों की तरह " राष्ट्र -निर्माता हमारे शिक्षकों " की आर्थिक एवं नैतिक मनोबल का ह्रास ना कर उनके आत्मबल और जज्बें का भी सम्मान कर  उनकी आर्थिक सहायता की और सफल कदम बढ़ाना चाहिए...|

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     "शालिनी कुमारी "
          शिक्षिका 
      मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार )

(स्वरचित एवं मौलिक गद्य रचना )

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