मंगलवार, 1 सितंबर 2020

सुप्रसिद्ध कवयित्री सीमा गर्ग जी द्वारा 'जिंदगी की जद्दोजहद..' विषय पर सुंदर रचना

नमन मंच 
शीर्षक --
जिंदगी की जद्दोजहद--

तन का चोला पहने मस्ती में विचरती थी,
सुखद नीड़ मेंं भविष्य के सपने बुनती थी!
अनदेखे भविष्य में झूम गोते लगाती थी,
भूतकाल की वासनायें मन भटकाती थी!
प्रत्यक्ष वर्तमान पल सोच विचार में बीते थे,
इसलिए उमर भर की कमाई से कर रीते थे!
पल छिन पहर दिन मास बर्ष दशक बनते थे,
तिमिरपुंज की तलाश में मिले कपटी धोखे थे!
एक दिन यूँ ही हृदय पीड़ा से थर्राने लगा, 
बहता स्वेद मेरा सम्पूर्ण गात डुबोने लगा!
 
निश्चेष्ट बिस्तर पर कटे पेड़ सी गिर पड़ी,
चेतना शून्य हो अंधकार में घिरने लगी!
अर्द्ध मूर्च्छित मेरे होशोहवास खोने लगी,
आत्मा पिंजर से निकल कहीं जाने लगी!
मणिपूर अलौकिक दिव्य प्रकाश आभा थी,
आभा-मंडल से निकलती अद्भुत प्रभा थी! 
प्राणों में अमृतमयी सिंचन से सजगता आई,
कुछ करने की हिदायत अन्तस में टकराई!
जद्दोजहद छोड दौड बच्चों से टकराने लगी ,
अंक में भींच उन्हें प्रेमसुधा रस बरसाने लगी!

सोते-सोते पहुँच गयी मैं पतिदेव के पास,
पति के सीने से लिपटती संवेदना का अहसास!
अलमारी खोल जेवर गहनें इन्हें सौंपने लगीं,
गाढ़े वक्त के फेर में छिपाये पैसे अब सौंपने लगी!
आँखों की गीली कोर में नाना अक्स उभरते थे,
काल फेरे से मेरे अपने अब मुझसे बिछड़ते थे!
कब कहाँ कैसे किसका दिल दुखाया था,
चलचित्र की मानिंद मानस पटल पर छाया था!
पुण्यमयी कर्मों का प्रकाशपुँज राह दिखाता था,
पापकर्मों का काला दानव मुँह खोल डसता था!

आशा की किरण कहीं नजर ना आती थी,
एकांत राहों में कंटकाकीर्ण नजर प्यासी थी!
आवाज दे के बुला ले वो सदा ना आती थी,
पाप-पुण्य की छाया से रूह क्रंदन करती थी! 
अजीब सी बेचैनी मेरे वजूद को डसती थी,
सुख शांति की तलाश में रूह भटकती थी!
हृदय में राग विराग की लहरें उमड़ती थी,
अनंत शून्य में अब चेतना विलीन हुई !
जिंदगी की जद्दोजहद काल निवाल हुई,
मेरी आखिरी मुलाकात यूँ मेरी रूह से हुई!

✍️ सीमा गर्ग मंजरी
मेरी स्वरचित रचना
मेरठ

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