रविवार, 4 अक्तूबर 2020

कवयित्री वीना आडवाणी जी द्वारा 'धूप और छांव' विषय पर रचना

वीना आडवानी
4.10.2020
मुक्तक शैली
धूप और छांव
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(1)
धूप और छांव जैसे सखा सहेली
पर दोनों ही विपरीत अलबेली
धूप से भागे छांव,छांव से भागे धूप
बताओ ये कैसी अदभुत सच पहेली।।

धूप और छांव जैसे सखा सहेली।।2।।

(2)
प्रकृति ने देखो सबको अपना अपना काम दिया
सूरज के नाम धूप तो पेड़ों के नाम छांव किया
ये सूरज और पेड़ प्रकृति के दिये काम कर रहे
 सूरज आते इंसा काम किया थक पेड़ो की छांव मे विश्राम किया।।

धूप और छांव जैसे सखा सहेली।।2।।

(3)
जिंंदगी भी कभी धूप कभी छांव जैसी ही होती 
कभी खुशी,कभी गम तो कभी तनाव संग खोती 
यादों मे जब कभी दिल मेरा खो जाता 
सच आंखे दर्द से भर तंहाईयों मे चुपके से रोती।। 

धूप और छांव जैसे सखा सहेली।।2।।

(4)
धूप और छांव से आज लड़ना सीख पाई हूं
तभी तो आज मैं सच अकेले कलम चलाई हूं
माना की वक्त खूब लगा हमें दर्द से निकलने मे
पर आज धूप हो या छांव हर दम मे मुस्काई हूं।।

धूप और छांव जैसे सखा सहेली।।2।।

वीना आडवानी
नागपुर, महाराष्ट्र
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