शनिवार, 3 अप्रैल 2021

फागुन भर बाबा देवर लागे# स्नेहलता पाण्डेय जी द्वारा

फागुन भर बाबा देवर लागे
सखी री  निरख वसंत
मन अति हर्षन लागे।
उड़त अबीर गुलाल
झूमत ,फागुन आवन लागे।

आम्र मंजरी मह मह महके,
पीली सरसों लह लह लहके।
फिरत करत रसपान,
प्रेमी भ्रमर  पगलाए लागे।

सगरी गुइयाँ ऐसे बौराई,
रिश्ता, नाता कछु देखत नाहीं।
ससुर पर डालत रंग,
फागुन भर बाबा देवर लागे।

उड़त अबीर चहुँ ओर,
रंग फ़ेंकत सगरो बरोर,
मदमस्त हुआ किसान,
झूमके कबीरा गावन लागे।

ननद, जिठानी करत ठिठोली,
सबके संग करत बरजोरी।
पीकर भंग मिश्रित रस,
मंडली  बहकन लागे।

सीमा पर तैनात साँवरिया,
घर अजहूँ नहिं आये।
सखियां खेलत पिय संग  होली,
देख मोरा हिय फाटन लागे।

इतने में मोरी सखियाँ आईं,
मोहें पकड़ के रंग डालीं।
हमहूँ आपन दुख बिसराए,
मोरे हिय होली का रंग चढ़न लागे।

स्नेहलता पाण्डेय
नई दिल्ली

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