रविवार, 2 अगस्त 2020

स्वतंत्रता दिवस की ७४ वीं वर्षगांठ पर आयोजित काव्य मिश्रित भाषण प्रतियोगिता पर अपने विचार

मां अहिल्या की नगरी इंदौर म. प्र. से मैं डॉ. रेखा मंडलोई स्वतंत्रता दिवस की ७४ वीं वर्षगांठ पर आयोजित काव्य मिश्रित भाषण प्रतियोगिता पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए बदलाव मंच पर उपस्थित हूं। इन दो काव्य पंक्तियों से अपने विचार प्रारम्भ करती हूं कि_
'खुशी मिलती हैं स्वतंत्र जीवन में सुखी रोटी खाकर,
वही तो है परतंत्रता के साथ परोसे स्वादिष्ट व्यंजनों से बेहतर।।'
१५ अगस्त १९४७ के दिन भारत अंग्रेजों की दासता से मुक्त होने में कामयाब रहा। इस आजादी की कहानी के लिए जिन्होंने कुर्बानियां दी आज उन्हीं की बात करते है। जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था,देश पर ब्रिटिश हुकूमत थी उस समय भारत का   प्रत्येक व्यक्ति देशप्रेम के भाव से सराबोर था कि - 
"देश की धरती पर जान कुर्बान हम हंसकर करेंगे,
तेरे चरणों में हम अपना तन, मन, धन सब रख देंगे।"
  जी हां, उस समय असंख्य माताओं ने अपनी गोद सूनी कर दी, हजारों सुहागिनों ने अपने सिंदूर को भारत के मस्तक पर लगाने के लिए दान कर दिया, लाखों बहनों ने देश की रक्षा के लिए राखी के पवित्र बंधन को देश प्रेम के लिए समर्पित कर दिया। उस समय स्वतंत्र भारत की आभा में एक उन्माद, एक आभा और एक उत्तेजना भर गई थी जो दिवाकर की रश्मि से स्वर्ण युक्त रूप पाकर इस भावना से भर   उठी थी कि - 
 ''शहीदों की चिताएं जलेगी,आग की लपटे उठेगी,
उस धधकती लपटों से भी बू ए वतन ही आएगी।"
 वीर शहीद भगत सिंह राजगुरु, रामप्रसाद बिस्मिल जैसे महान देश भक्तों ने हंसते- हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया। वतन पर जान कुर्बान करने वाले हर व्यक्ति में यह भाव समाहित थे कि- 
"देश पर मिटने के भाव हम सब में मरते दम तक रहेंगे,
देश पर न्यौछावर होने के लिए हम फिर जन्म लेंगे।"
  परन्तु अफसोस इस बात का है कि स्वतंत्रता के पूर्व जो लहर देश के कण कण में व्याप्त थी वह वर्तमान समय में लुप्त सी हो गई है। आज देश में स्वार्थ, धनलोलुपता, भ्रष्टाचार और अनैतिकता जैसे भावों का बोलबाला बड़ता जा रहा है, ऐसे माहौल के लिए मुझे ये पंक्तियां जीवंत लगती है कि_ 
"हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी,
मिल बैठ कर हम विचारे ये समस्याएं सभी।'
  इन दिनों एक और समस्या से निपटने के लिए हमारे भारतीय वीर जवान पुरजोर कोशिश कर रहे हैं, समस्या है भारत चीन विवाद। चीन के मंसूबे दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं, अब समय आ गया है कि भारतीय सेना के साथ हर एक सपूत अपनी सुसुप्तावस्था को त्याग कर चीन को मुंह तोड़ जवाब देने को तैयार रहें। अंत में अपने विचार को विराम देने से पूर्व हमारे सैनिकों के अदम्य साहस और उत्साह के भाव जो देश रक्षा के लिए उनके मन में समाहित है उसे प्रस्तुत करती हूं कि किस तरह भारतीय वीर जवान चीन को ललकार रहे हैं_
लद्दाख की गलबान घाटी में बस गूंजे एक ही नारा,
चीन तुझे ललकार रहा है आज भारत देश हमारा।
देश पर जीना, देश पर मरना यही है धर्म हमारा,
जाग चुकी हैं युवा पीढ़ी ना होने देंगे अब बंटवारा।
गंगा की लहरों में भी गूंजे सतत बस एक ही नारा,
आज दुश्मनों की होली से होगा पूरा प्रण हमारा।
यह कलाम के सपनों से भरा सुंदर देश हमारा,
विश्व गुरु बन भारत अब चमकेगा जैसे ध्रुव तारा।
  जय हिन्द, जय भारत, वन्दे मातरम्।
                           डॉ. रेखा मंडलोई इंदौर  म. प्र.
                               शिक्षिका,कवियित्री
                                 930197177

Badlavmanch

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें