मंगलवार, 29 सितंबर 2020

कवि अरविन्द अकेला जी द्वारा रचना (विषय-जो चाहे कह लो )

लघुकथा 
        जो चाहे कह लो 
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    मोहल्ले की कमला नानी सुबह-सुबह फुल तोड़ने के लिये अपने घर से बाहर थोड़ी देर के लिये निकली हीं थी कि उसे किसी नवजात बच्चे के रोने की आवाज  सुनायी दी ।
        आवाज सुनते हीं कमला नानी इधर-उधर देखने लगी कि आवाज किधर से आ रही है। इधर उधर देखने के बाद कमला नानी जब कचड़े के डिब्बे के पास जाकर देखा तो वहाँ उसे रोती  हुई नवजात बच्ची दिखाई दी तब कमला नानी उसे आश्चर्य से देखने लगी। कमला नानी सोचने लगी कि यहाँ से चुपके से इस नवजात बच्ची को घर ले जाना कानुनी रुप से ठीक बात नहीं, सो  मोहल्ले के चार पाँच महिलाओं को लाकर इसे दिखाती हूँ । कमला नानी घर-घर जाकर चार पाँच महिलाओं को बुलाकर लायी।
       उन चार पाँच महिलाओं में से एक महिला राकेश की माँ ने कहा ' पता नहीं कौन यहाँ अपना पाप छोड़ गया है '। राय जी की पत्नी ने कहा कि 'बच्ची तो बहुत सुन्दर है,पर किसी ने लगातार बेटी जन्म के कारण कोई माँ अपनी बेटी को यहाँ छोड़ आयी  है। मोहल्ले की औरत राधा ने कहा ' 'बच्ची के साथ यह इंसाफ नहीं है। पिन्टू  की माँ दमयंती देवी ने कहा कि 'यह सब किसी कुँवारी माँ की करामत है ' जितनी मुँह उतनी बातें हो रही थीं।
    कमला नानी ने सबको लथाड़ते हुये कहा कि " तुम सब बहुत उल्टी पल्टी बोल रही हो,जो मन में आता है बोले जा रही है।"
     "तुम सब अपने अपने मन से जो चाहती हो वहीं बातें करती हो। तुम लोग कैसे कह सकती हो कि यह किसी का पाप है,नाजायज है ।  तुम लोग जो चाहो कह लो।यह किसी का पाप है, अभिशाप है या किसी के लिये बरदान है, यह तो सिर्फ भगवान हीं जानता है। यह सब उसी का रचा खेल है। यह सब उसी की हीं माया है जो इस बच्ची पर पड़ी किसी की छाया है। उसके आगे किसी की मर्जी नहीं चलती। उसके आगे किसी की मर्जी नहीं चलती है।"
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          अरविन्द अकेला

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