रविवार, 27 सितंबर 2020

कवयित्री सुदेष्ना जी द्वारा 'बेटी' विषय पर रचना

एक संसमरण/एक लघुकथा  !!

रोटी बेलते बेलते , नीला पूछी 
"मैडम , आपके देवर डॉक्टर हैं न ? ",
मैं पूछी, " क्या हुआ, सब ठीक तो हैं न ? 
बेटी, बेटा , घर पर सब कुशल से हैं न ?"
 
“जी मैडम !” , बस इतना बोल  वो चुप हो गयी। 
फिर गैस पर सब्जी चढ़ाकर , आटें में गुम हो गयी |
एक बेचैनी सी झलक रही थी , 
कुछ परेशानी सी दिख रही थी, 
एक झिझक सी महसूस हो रही थी। 
 
“मैडम , एक बात बोलूँ ?
आप तो शहर से हैं , डॉक्टर के रिश्तेदार  भी हैं , 
 बच्चे का लिंग जांच करवाना हैं ,बहन पेट से है। 
पहली वाली तो वैसे ही बेटी हो गयी , अब बस बेटे की ही आस है| “
 
बस इतना सुन, मेरा खून खौल गया था , 
मेरा पूरा शरीर सुन्न सा हो गया था 
कुछ और न सुन्ना, ये ठान लिया था| |
दिमाग ठीक तो हैं न, हत्या कर डालोगी ?
बिटिया हुई तो , गिरा डालोगी ?
भगवन से न सही , कानून से तो डरो। “

पत्ते की तरह  काँप रही थी, ये खून हैं , 
ये पाप हैं , ये सोच सोच मन ही मन रो रही थी मैं। 
 
“ऐसा क्यों करते हो ? बेटी तुम क्यों नहीं चाहते हो ?”
नीला मुस्कुराते  हुए बोली , “मैडम, आप बड़े लोग हैं , पढ़े लिखे हैं ;
आज भी , गांव में बेटी बोझ हैं , 
दहेज़ की डर से , हम तो बस बेटा ही चाहे हैं। 
गांव में पैसा देंगे और डॉक्टर सब बता देगा , 
आप ये दिखावा शहर में ही दिखाते हैं , मन ही मन सब बेटा ही चाहते हैं। 
 
अगले दस महीने , वो मेरे घर नहीं आई |
अगले दस महीने रोटी मैंने खुद ही बनाई , 
अपराध बोध की ग्लानि , मन में थी छाई।

उसने मेरे घर खाना बनाना छोड़ दिया |
मेरा मन मुझे रोज़ कोसता रहा , कहीं मैंने एक बिटिया को मरने तो नहीं दिया।  
 
एक दिन , फिर बाजार के रास्ते नीला दिखी|
 साथ एक दूसरी स्त्री भी थी । 
 गोद में ६ महीना का बेटा ; और एक २ साल की बेटी , 
हाथपकड़ साथ चल रही थी |
 
मन ही मन , मैं चाह रही थी ,
यह वही बहन हो , और उसका वही बेटा हो , 
यही सोच  रही थी । 
 
“मैडम , सुनिए !! आप अब भी गुस्सा हैं क्या ?
देखिये भगवन ने सुन ली , बेटी नहीं बेटा दिया। “, नीला  ने  दूर  आवाज़  लगाई  |
 
उसके आँखों में चमक थी , जो मन ही मन मुझे कचोट रही थी , 
उस चमक की रौशनी से , ज्यूँ चुभ सी रही थी।
पर एक और बेटी नहीं मारी गयी , इस बात से थोड़ी आश्वस्त थी। 
 पहली बार शायद, अनमने मन से, भगवन से बोल पड़ी – “भगवान् अच्छा  हुआ , उसे बेटा हुआ।“ 
  
“मुबारक हो , बेटा हुआ।   
पर एक वादा करो , 
अपनी बेटी को खूब पढ़ाओगी , 
बेटे के शादी में दहेज नहीं लोगी , 
 
पढाई में मदद मैं कर दूंगी, ट्यूशन भी मैं पढ़ा दूंगी , 
पैसा ऐसे भी बचा थोड़ा लेना, पर न ,दहेज़ देना न लेना!
 
बस इतनी मदद कर दो , फिर कोई माँ न बोले, बेटी नहीं चाहिए , दहेज़ नहीं दे पाऊँगी|”
 
 दो महीने बाद वह फिर आयी , “ जी मैडम! सॉरी  , गलती हो गयी | समझ गई !!”

पर कहीं मन नहीं माना ,
 जाने और कितने हैं ऐसे ,
जिसने बेटी को बस बोझ ही माना।
कहीं समाज की कुरीतियाँ एक बहुत बड़ी कारण हैं , 
जिसके परिणाम स्वरुप , बेटियाँ आज भी कहीं अनचाही हैं।

कहीं, मैं भी उतनी ही दोषी थी , गुनाह देख , जब चुप बैठी थी । 

सुदेष्ना, हैदराबाद. 27-09-2020

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