रविवार, 27 सितंबर 2020

कवि डॉ. मलकप्पा अलियास महेश जी द्वारा 'बेटी' विषय पर रचना

मंच को नमन 

       बेटी 

|बेटी हूँ इस दौर की |

एक दौर था ऐसा 

मेरे जन्म से लेकर घर,
में होती थी चिंता|

एक दौर ऐसा था.. 
मेरे जन्म से पहले ही,
भ्रूणहत्या करने के लिए सोचते थे,
इस संसार में|

एक दौर था ऐसा ..

मेरे जन्मदिन से ही पीडा झेल ती है , माँ मेरे|

एक दौर था ऐसा.. 

मेरे जन्म से ही होते थे,
चर्चा इस संसार में|

एक दौर था ऐसा.. 

मेरे जन्म से ही इकट्ठा करते थे
पैसा पपा मेरी पढ़ाई के लिए|

एक दौर था ऐसा..

मेरे जन्म से ही ढूंढना,
सूरू करते पती मेरे लिए|

एक दौर था ऐसा.. 

मेरे जन्म से ही चर्चा करते थे, 
घर में मेरे पपा के दूसरी शादी के |
एक दौर था ऐसा..

लेकिन अब कहते हैं हमारे प्रधान ,
बेटी बचाओ बेटी पढा़ओ |

लेकिन अब नहीं करेंगे ,मेरी बुराई, 
मेरे जन्म से ही मुझे मानते हैं ,
घर की लक्ष्मी |

जिस घर में मेरे जन्म होता है ,
उस घर को कहते शांतिनिवास |

जिस घर में जन्म ली हूँ, 
उस घर की प्रगति के पथ हूँ |

जिस देश में मैं जन्मी हूँ ,
उस देश को कहते हैं भारत माता|
        
      (अंबूतनयमहेश) 
डॉ मलकप्पा अलियास महेश बेंगलूर कर्नाटक

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