बुधवार, 7 अक्तूबर 2020

कवयित्री मधु भूतरा जी द्वारा रचना ’“मैं तुझमें अधूरा हूँ”

*नमन मंच*

*दिनांक - 06.10.2020*

*विषय - मैं तुझमें अधूरा हूँ*

पूर्णता की चाह 
हर सुख की राह 
समाया कण कण 
पर ऐसा क्यूँ लगता है 
मैं तुझमें अधूरा हूँ।

हर धड़कन तेरी आस
दिल में प्रेम विश्वास 
मिले दो ज़िस्म प्यास 
पर ऐसा क्यूँ लगता है 
मैं तुझमें अधूरा हूँ ।

राधा कृष्ण प्रेम अगन 
दैवीय पराकाष्ठा मिलन 
अनंत असीम हर क्षण 
पर ऐसा क्यूँ लगता है 
मैं तुझमें अधूरा हूँ।

 तड़प अगन ज्वाला
आँखों का मतवाला 
होठों पर मधुशाला 
पर ऐसा क्यूँ लगता है 
मैं तुझमें अधूरा हूँ।

हौले हौले सरकती 
आह मुख निकलती 
संकड़ी छोटी गली
पर ऐसा क्यूँ लगता है
मैं तुझमें अधूरा हूँ।

साँसों की तपिश
पुकारता यह मन
रात ठंडी चाँदनी
पर ऐसा क्यूँ लगता है
मैं तुझमें अधूरा हूँ।

बदन की सौंधी खुशबू
बूँद बूँद छलका पानी 
अनंत खुला आकाश 
पर ऐसा क्यूँ लगता है 
मैं तुझमें अधूरा हूँ। 

उलझी जुल्फें गालों पर 
सिलवटें कपड़ों की 
खुमारी आँखों में 
पर ऐसा क्यूँ लगता है 
मैं तुझमें अधूरा हूँ।

कसक एक एहसास
कस्तूरी सुगंध तलाश
काव्यत्व सफल प्रयास
पर ऐसा क्यूँ लगता है
मैं तुझमें अधूरा हूँ।

*मधु भूतड़ा* 
*गुलाबी नगरी जयपुर से*

#ekpehalbymadhubhutra

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