गुरुवार, 1 अक्तूबर 2020

कवयित्री शशिलता पाण्डेय जी द्वारा रचना “विषय-बुढापा"

❤️बुढापा❤️
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जिन्दगी का सफर बड़ा ही सुहाना,
बसंती बयारों से झूमता बचपन।
 हर हाल में मस्ती खेल में बिताना ,
कटती जोश में जवानी उम्र पचपन।
होता अवस्थान बुढ़ापे का जमाना,
विश्रांति काल का तन शक्तिहीन।
जिन्दगी का दस्तूर सफर में खो जाना,
संचित -पोटली अनुभवों की वृद्धतन।
शैशवकाल आरम्भ जवानी का जमाना,
रिश्तों का फर्ज कर परिश्रम कमाना धन।
पड़ाव बुढापा रोग-ब्याधि का बहाना,
सहारा छड़ी का, जिन्दगी का परिवर्तन।
जिन्दगी का सफर ऋतुओं सा पुराना,
युग-युग से अनोखा कुदरत का कानून।
हर हाल में मुस्कुराकर दुनियादारी निभाना,
हरदम हर उम्र में बदलते मौसम  से जीवन।
जिंदा दिली से लुत्फ चाहिए हर पल उठाना,
रिश्तों काताना-बाना जवानी बुढापा बचपन।
जीवन-मरण के मध्य के सफर का फसाना,
बनती कहानी जीवन सबकी अलग दास्तान।
हर पड़ाव का अपना मजा खुशी देना लेना,
ये बुढ़ापा भी एक सुखद अनुभूति जाता बन।
संकल्प ले मानव-धर्म पर-हित में जीवन बिताना ।
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🌹 समाप्त🌹 स्वरचित और मौलिक
                     सर्वधिकार सुरक्षित
     रचनाकारा-शशिलता पाण्डेय




  




  

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