शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2020

शास्त्री जी#सुजीत संगम बाँका, बिहार#

● सादगी, देशभक्ति और इमानदारी 
के पर्याय थे प्रधानमंत्री शास्त्री

■ जयंती विशेष 

यह किस्सा तब का है जब लाल बहादुर शास्त्री गृह मंत्री थे। एक बार वे और मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर, दिल्ली के क़ुतुब एन्क्लेव इलाके से वापस आ रहे थे। दिल्ली के एम्स के पास एक रेलवे फाटक था। ट्रेन आने वाली थी। फाटक बंद था। गृह मंत्री की गाड़ी रुक गयी। कार के बगल में गन्ने वाले को देखकर शास्त्री जी बोले, "कुलदीप, जब तक फ़ाटक खुलता है क्यूं न गन्ने का रस पिया जाए?"

जब तक कुलदीप नैयर कुछ कहते, लाल बहादुर शास्त्री उतरे, गन्ने वाले को पैसे दिए और दो गिलास रस ले आये। कुछ देर बाद फ़ाटक खुला और उनकी गाड़ी आगे बढ़ गयी। गन्ने वाले को शायद ही पता चला हो कि उसका ग्राहक देश का गृह मंत्री था। उस जमाने में प्रधानमंत्री की गाड़ी में भी एक ही सिपाही होता था। ऊपर से शास्त्री जी तो किसी भी तरह से रोबीले व्यक्ति नहीं लगते थे। उनका आचरण बेहद सादगी भरा था। इतना कि जब वे गृह मंत्री नहीं रहे तो अपने घर में ज़रूरत से ज़्यादा बिजली इस्तेमाल नहीं करते थे। जब किसी ने पूछा कि क्यों वे अक्सर एक बल्ब की रोशनी में ही काम निपटाते हैं तो उनका ज़वाब था, "अब मैं गृह मंत्री नहीं हूं, इतना ख़र्च नहीं उठा सकता।"

भारतीय राजनीति में जब भी सादगी की बात होगी, लाल बहादुर शास्त्री सबसे पहले पायदान पर होंगे। पर देश को संभालने के लिए सादगी काफी नहीं होती। शास्त्री जी की सादगी उनके व्यक्तित्व पर अक्सर भारी रही है लेकिन सादगी उनके व्यक्तित्व का सिर्फ एक पक्ष थी। संकटों को सुलझाने की उनकी काबिलियत और मजबूत फैसले करने जैसी बातें भी उन्हें बाकी राजनेताओं से अलहदा बनाती थीं।

देश के सच्चे सपूत लालबहादुर शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को मुगलसराय (वाराणसी) में हुआ था। कहा जाता है कि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं, ठीक वैसा ही गुदड़ी के लाल के साथ भी हुआ। प्रतिभा के धनी शास्त्री जी ने गरीबी और अभाव में जन्म लेने के बावजूद अपनी बुद्धिमत्ता से देश-दुनिया में अपना लोहा मनवाया। संस्कृत भाषा में स्नातक स्तर तक की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् वे भारत सेवक संघ से जुड़ गये और देशसेवा का व्रत लेते हुए यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्री जी सच्चे गांधीवादी थे। उन्होंने अपना सारा जीवन सादगी से बिताया और गरीबों की सेवा में लगे रहे। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों एवं आन्दोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही, परिणामस्वरूप उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। स्वाधीनता संग्राम के जिन आन्दोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही उनमें 1921 का असहयोग आंदोलन, 1930 का दांडी मार्च तथा 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन उल्लेखनीय है।

भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात शास्त्री जी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था। गोविंद बल्लभ पंत के मन्त्रिमण्डल में उन्हें पुलिस एवं परिवहन मन्त्रालय सौंपा गया। परिवहन मन्त्री के कार्यकाल में उन्होंने प्रथम बार महिला संवाहकों (कण्डक्टर्स) की नियुक्ति की थी। पुलिस मन्त्री होने के बाद उन्होंने भीड़ को नियन्त्रण में रखने के लिये लाठी की जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारम्भ कराया। कहते हैं जब शास्त्री जी गृहमंत्री थे तो वे पंडित नेहरू के चीन रणनीति को लेकर आश्वस्त नहीं थे। वे कहा करते थे कि चीन एक आस्तीन का सांप है और पंडित नेहरू उसका षड्यंत्र समझ नही पा रहे हैं। और हुआ भी कुछ ऐसा ही। जंग हुई, रणनीतिक ग़लतियां हुईं और भारत हार का मुंह देखना पड़ा। इस हार के पीछे लेफ्टिनेंट जनरल कौल का पूर्वी कमान का अध्यक्ष होना एक कारण बताया जाता है। कौल कश्मीरी थे और रक्षा मंत्री वीके मेनन के ख़ास विश्वस्त भी। फौज से ज़्यादा फौजियों के हाउसिंग प्रोजेक्ट में दिलचस्पी लेकर वे अपनी समाजवादी छवि चमकाने में लगे रहते। शास्त्री जी कौल की नियुक्ति पर अपनी नाराज़गी पहले हीं ज़ाहिर कर चुके थे, पर उनकी नहीं सुनी गई। बताते हैं कि चीन के हमले के कुछ दिनों बाद कौल साहब पेट की गड़बड़ी की शिकायत को लेकर दिल्ली चले आये थे। दरअसल, वे मोर्चे पर सारे गलत रणनैतिक फ़ैसले कर रहे थे और इसका ख़ामियाज़ा देश भुगत रहा था। उनकी ग़ैर मौजूदगी में लेफ्टिनेंट जनरल हरबक्श सिंह ने दिलेरी से कमान संभाली। इसके पहले अपने माथे पर अमिट कलंक लगे, जनरल कौल वापस कमान संभालने आ गए परंतु तब तक चीन जंग जीत चुका था।

जब चीन ने एकतरफ़ा युद्ध विराम किया तो लाल बहादुर शास्त्री असम के तेजपुर गए। जनरल कौल ने उन्हें शांति समझौता करने की सलाह दी। शास्त्री ने अनसुना कर दिया। उनके रवैये से कौल समझ गए कि उनके दिन पूरे हो गए हैं। हार के कई कारण थे। नेहरू का चीन को लेकर ग़लत आकलन, फौज में संसाधनों की कमी की तत्कालीन सेनाध्यक्ष पीएन थापर की शिकायत न सुना जाना और मोर्चे पर लेफ्टिनेंट जनरल कौल की रणनीतिक गलतियां। पर ठीकरा फूटा सेनाध्यक्ष थापर के सर पर। उन्हें इस्तीफ़ा देने का हुक्म सुना दिया गया। जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमन्त्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान के बाद साफ-सुथरी छवि के कारण शास्त्रीजी को 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया। उन्होंने 9 जून 1964 को भारत के प्रधान मन्त्री का पद भार ग्रहण किया।

उनके शासनकाल में 1965 का भारत पाक युद्ध शुरू हो गया। इससे तीन वर्ष पूर्व चीन से हुये युद्ध में भारत हार चुका था। शास्त्रीजी ने अप्रत्याशित रूप से हुए इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी जिसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी।

ताशकन्द में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब ख़ान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी जो आज तक भी रहस्य का विषय बना हुआ है। उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये उन्हें मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मानित किया गया। जब शास्त्री जी जैसे व्यक्तित्व से आज के राजनेताओं की तुलना करने का प्रयास करता हूँ तो सोच में पड़ जाता हूँ कि क्या इन परिस्थितियों में अपना देश आजाद हो पाता? 
             
                सुजीत संगम
                      बाँका, बिहार

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