सोमवार, 23 नवंबर 2020

कवयित्री मधु भूतड़ा द्वारा 'बाल दिवस' विषय पर रचना

राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय "बदलाव मंच" साप्ताहिक प्रतियोगिता 

*नमन मंच*

*दिनांक - 15.10.2020*

*विषय - बाल दिवस* 

*शीर्षक - बचपन की शरारतें* 

*विधा - कविता* 

*एक माँ की कलम से*

मैंने अपने बच्चों में अपना बचपन ढूँढ़ा
नम हुई आँखें उम्मीदों का दामन बंधा। 

हर दिन नई नटखटता बहुत शैतानियाँ
मस्ती से भरी ढेरों बचपन की कहानियां। 

कभी मार फटकार खाया करते थे
कभी टीचर की हँसी उड़ाया करते थे।

होमवर्क के नाम पर नौटंकी दिखाते थे 
पेट दर्द अक्सर  झूठा बहाना करते थे।

स्कूल से आकर टिफिन बस्ता फेंकते थे 
मोहल्ले में खेलने को दौड़ जाया करते थे। 

कभी जिद कभी गुस्सा दिखाया करते थे 
मम्मी पापा दादा दादी से मनवाया करते थे। 

खिलखिलाहट गूंजते घर गलियारे होते थे 
प्यारी रातें हंसते गाते दिन मेरे बीत जाते थे 

न फ़िक्र न चिन्ता मस्ती का था आलम
ऐसा बचपन जिसमें न था कभी कोई गम। 

संजो रखी है मैंने प्यारी बचपन की यादें
बच्चों के बचपन से देखती टकटकी बांधे। 

बचपन से मैंने अपना नवजीवन पाया
माँ बन जीवन की हर ख़ुशियाँ सजाया। 

*मधु भूतड़ा*
*गुलाबी नगरी जयपुर से*

(मौलिक व स्वरचित रचना)

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