सोमवार, 9 नवंबर 2020

योगिता चौरसिया जी द्वारा खूबसूरत रचना#भाईचारा#

 - अंतरराष्ट्रीय बदलाव मंच साप्ताहिक लघुकथा प्रतियोगिता

विषय- भाईचारा
 शहर में गणपति उत्सव चल रहा था और इस उपलक्ष्य में यहां जगह जगह पर गणपति जी के छोटे- मोटे पंडाल लगे हुए थे, जिनमें भगवान श्री गणेश की अलग अलग भाव- भंगिमाओं वाली मूर्तियां पांच दिन के लिए स्थापित की गई थीं। इन दिनों दौरान शाम के समय लगभग पूरा शहर ही इन चिताकर्षक मूर्तियों के दर्शन करने हेतु निकल पड़ता था और इन सभी पंडालों में जबरदस्त भीड़ रहा करती थी। यह एक सांप्रदायिक शहर था जहां हिंदू- मुस्लिम दंगा होना एक सामान्य बात थी और अनेक मर्तबा तो बिल्कुल नगण्य बात पर भी सांप्रदायिक दंगे हो जाया करते थे। जहां हिंदू बस्ती और मुस्लिम बस्ती एक दूसरे से अलग पड़ते थे, वहीं चौराहे पर एक गणेश पंडाल लगा हुआ था जिसमें गणेश जी बाल स्वरूप में, अन्य मुषकों के साथ स्कूल जाते दिखाई पड़ रहे थे और यह मूर्ति शहर में चर्चा का केंद्र बनी हुई थी और बच्चों के साथ ही बड़े भी इस मूर्ति को देखने के लिए उमड़ रहे थे। एक दिन जब इस शहर में रहने वाले एक शिक्षक, सक्सेना साहब इस मूर्ति को देखने के लिए पंडाल में आए तो उन्होंने देखा कि मुस्लिम बस्ती की तरफ से एक छोटा बच्चा तेजी से दौड़ता हुआ आया और इस पंडाल में इस मूर्ति को बड़े आनंद से देखने लगा। उस बच्चे के पीछे पीछे ही उसके पिता आए और उस बच्चे को वहां गणेश जी की मूर्ति के सामने खड़ा देख सक्सेना साहब को बोलने लगे कि साहब हमारे बच्चे को यह मूर्ति इतनी अच्छी लगती है कि यह मौका देखते ही घर से निकल यहां मूर्ति को देखने आ जाता है।  यह सुन सक्सेना साहब बोले कि स्वार्थी लोग ही अपने फायदे के लिए इस शहर में बात बात पर सांप्रदायिक दंगे भड़काते हैं मगर बच्चों में तो खुद ईश्वर बसता है और यही हम लोगों को सच्चा भाईचारा सिखाते हैं। यह सुन कर बच्चे के पिता भावुक हो गए और वे सक्सेना साहब के गले लग गए।

रचनाकार@ स्वरचित एवम् मौलिक
प्रो.डॉ.दिवाकर दिनेश गौड़
गोधरा (गुजरात)
[08/11, 21:11] रूपा व्यास बदलाव मंच: राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय बदलाव मंच
साप्ताहिक लघुकथा प्रतियोगिता

विषय-एकता,भाईचारा देशप्रेम
शीर्षक- झंडा
           बात उस समय कि हैं जब देश आजाद नहीं 
हुआ था।  एक छोटे से परिवारमे माँ-पिताजी के साथ उनके दो बच्चे आजाद और क्रांति नाम के थे उनका नाम भी गुलामी से परेशान होकर रखा गया था।आजाद बेटा और क्रांति बिटिया थी।उस समय दोनों की उम्र बहुत कम थी,पर आजादी पाने का जूनून था।राष्ट्रीय एकता का जुलूस निकलना था,पर राजा  ने अंग्रेजों के दबाव में मना कर दिया था।और हर  शख्स हिदायत दी गई थी, कि कोई भी जुलूस ना निकाले। दोनों बच्चे खेलते तो भी उनका खेल देश में चल रहा माहौल हुआ करता था। दोनों ने निश्चय किया कि जुलूस तो निकलेगा फिर चाहें कुछ भी हो।बहन क्रांति ने भाई के साथ मिल क्रांति लाई अपने दुप्पटे को फाड़कर जुलूस का झंडा बना दिया,भाई आजाद ने डंडे को लाकर झंडे में लगा घूमने लगा।बहन ने उसका तिलक लगाया।भाई आजाद अकेला ही निकल पड़ा।राजा के सैनिकों ने बच्चे को गोली मार दी। फिर बहन दौड़ कर भाई को और जुलूस को थाम लेतीं हैं।भाई तो बच नहीं पता पर भाई की अर्थी के साथ आगे आगे बहन झंडा लेकर और भाई की अर्थी के पीछे जुलूस निकलने वाले सारे क्रांति कारी सफल हुये अंग्रेज और बादशाह(राजा) कुछ न कर पाये।
    दोनों बच्चों ने एकता,भाईचारा और देशप्रेम की मिशाल बने।बच्चे की मौत ने सबको झकझोर कर रख दिया और दिन-रात सभी ने एक कर दिया आजादी के लिये,आज हम जो सुख भोग रहे ऐसे ही एकता, भाईचारा और देश प्रेम की वजह से ही हैं।
आगे भी हम सभी मिलकर ऐसे ही चले तो हमारा देश स्वर्णिम भारत बन जायेगा।
ऐसे शूर वीरो को, मेरा शत्-शत् नमन।
इनके लिए शीश झुकाऊँ, करुँ वंदन।
जान की बाजी लगा दी,देश के खातिर।
ये हमारे देश के लिए है,महकते चंदन।।
स्वरचित..
योगिता चौरसिया
मंडला म.प्र.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें