शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

शशिलता पाण्डेय जी द्वारा बेहतरीन रचना#किसान#

नमन बदलाव मंच
राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय मंच
 दिनांक-2/12/2020
दिवस-बुधवार
विधा-काव्य
विषय-किसान
किसान ,
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जल- पावक पवन,
 धरती-गगन की।
नेमत जीवित रहने को,
 देते है भगवान।
अन्न उगाकर,
 हम सबको भोजन देता।
धरती का भगवान,
 अन्नदाता किसान।
करके दिन-रात,
 एक कठिन परिश्रम।
अन्नदाता अन्न करते,
 मेहनत से उत्पन्न।
प्रखर धूप या हो,
 बरसात ठंढी का मौसम।
बड़ी कठिनता से,
 पहुचाते बाजारों तक।
अनाज के द्वारा होता,
 भोजन का निर्माण।
मानव-जीवन के,
खातिर होता आवश्यक।
बड़ी दुखद ये लगती बातें,
जो सबका पेट भरता किसान।
लागत मूल्य भी नही मिलता,
करने को मजबूर आंदोलन।
सम्पूर्ण विश्व का अन्नदाता,
अन्न उगाकर करता पोषण।
 गरीबी और कर्ज में,
 दबकर होता उसका शोषण।
कभी कहीं कर्ज तले,
 डूब करता आत्मघात।
किसान अनावृष्टि,
 कभी अतिवृष्टि से पीड़ित।
कानून बनाये सरकार ने,
 देश सुरक्षा के खातिर।
पर किसान कर्ज में,
 दबा आत्महत्या को आतुर।
अगर अन्नदाता हमारे,
 इतने दुखी और मजबूर।
सारा विश्व मरेगा भुखों,
 नही कभी महँगाई होगी दूर।
आज सम्पूर्ण विश्व मे,
 वैश्विक कोरोना महामारी।
किसान अधिक कष्ट में,
 पहले से परेशान किसान।
किसी को विकट समस्या का,
इनके नही कभी अनुमान।
चुनौतियाँ कटाई,मड़ाई,
 कढ़ाई से बेचने अन्नभंडार।
लॉकडाउन में दुरियों का,
 पालन मेहनत को मजबूर।
बीते 74 साल आजादी के,
 आज भी घाटे की खेती।
मिलती सरकारी- सुविधा,
अर्थव्यवस्था पटरी पर होती।
गरीबी और भूख से,
करते महानगरों में पलायन।
सरकार की लापरवाही भी,
इसका बहुत बड़ा कारण।
हमारे अन्नदाता को,
थोड़ी भी मिलती सुविधा सरकारी,
 देश की डगमगाती,
अर्थव्यवस्था पटरी आती सारी।
हमारा भरते पेट किसान,
धरती का दूजा होते भगवान,
हमसब इनकी परेशानियों से,
अनजान जय जवान जय किसान।
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स्वरचित और मौलिक
सर्वधिकार सुरक्षित
कवयित्री:-शशिलता पाण्डेय

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